रामबाबू मित्तल, मुजफ्फरनगर: कवाल कांड को पूरे 12 साल हो गए, लेकिन इस घटना की चुभन आज भी पीड़ित परिवारों के दिल से नहीं निकली। मलिकपुरा निवासी गौरव के पिता रवींद्र सिंह ने घटना की बरसी पर बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा ने उनके बेटे की शहादत से चुनावी फायदा तो उठाया, लेकिन पीड़ित परिवारों की मदद के नाम पर आज तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। उन्होंने साफ कहा कि भाजपा के नेताओं ने वादों और सांत्वना के अलावा कभी कोई वास्तविक सहयोग नहीं दिया।
'वादे किए, लेकिन निभाया कोई नहीं'
“12 साल हो गए, लेकिन कोई बदलाव नहीं दिखा। कवाल कांड में मेरे बेटे गौरव और उसके भाई सचिन को बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला गया था। उस समय भाजपा विपक्ष में थी और बड़े-बड़े नेता हमारे पास आए। राजनाथ सिंह आए, लक्ष्मीकांत बाजपेई आए, सभी ने कहा कि हम आपके साथ हैं, हम वकील करेंगे, मदद करेंगे, लेकिन चुनाव के बाद सबने हमें भुला दिया। कोई नेता फिर हमारी सुध लेने तक नहीं आया।” उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने केवल सांत्वना दी और चुनावी मंचों पर इस मुद्दे को भुनाकर सत्ता हासिल कर ली। लेकिन न तो मुकदमों में मदद की गई, न ही परिवारों के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया।
सड़क और लाइसेंस का अधूरा वादा
रवींद्र सिंह ने कहा कि कवाल कांड के बाद पीड़ित परिवारों की सुरक्षा और सुविधा के लिए बॉयपास सड़क की मांग उठी थी। इस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कवाल बाइपास सड़क बनवाकर दिया। भाजपा की तरफ से भी नहर की पटरी की सड़क का वादा किया गया था और 15 लाख रुपये भी मंजूर हुए थे, लेकिन वह अधूरी ही रह गई।
“भाजपा ने न तो सड़क पूरी करवाई, न ही रोजगार के लिए लाइसेंस दिए। केवल एक लड़के राहुल का लाइसेंस बना, बाकी किसी को कुछ नहीं मिला। PWD मंत्री ब्रजेश कुंवर तक ने फोन उठाना बंद कर दिया। आज भी हम इलाहाबाद की अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन सरकार से कोई मदद नहीं मिलती।”
“दिल्ली से लेकर लखनऊ तक कोई सुनवाई नहीं”
गौरव के पिता का दर्द साफ छलक रहा था। उन्होंने कहा कि वे दिल्ली तक नेताओं से गुहार लगाने गए, लेकिन वहां भी यही जवाब मिला कि “हमने जिम्मेदारों को मंत्री और विधायक बना दिया है, अब उन्हीं से कहो।”
आरोप-भाजपा में अपने ही कार्यकर्ताओं नहीं कोई सुनवाई
“भाजपा कार्यकर्ताओं की भी कोई इज्जत नहीं करती। हमारे क्षेत्र का विधायक बिक्रम सैनी कभी हमारे यहां नहीं आए। जिला स्तर पर भी भाजपा के नेता सिर्फ अपने स्वार्थ तक सीमित हैं। जनता और कार्यकर्ताओं की सुनवाई कहीं नहीं होती।”
घटना की याद में छलक पड़े आंसू
27 अगस्त 2013 को कवाल गांव में वह दर्दनाक घटना घटी थी, जिसने पूरे पश्चिमी यूपी को दहला दिया। गौरव और सचिन, अपने गांव मलिकपुरा से कवाल गए थे। वहीं युवती से छेड़छाड़ के आरोपी शाहनवाज की पिटाई के बाद जब दोनों युवक लौट रहे थे तो गांव वालों ने उन्हें घेर लिया और ईंट-पत्थरों से पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी। इलाज के दौरान शाहनवाज की भी मौत हो गई थी। यह घटना तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान हुई थी। आरोप है कि उसके बाद मुस्लिम समुदाय ने हिंदू परिवारों को प्रताड़ित किया। इससे गुस्सा भड़का और लगातार पंचायतें हुईं। 31 अगस्त और 7 सितंबर 2013 को नगला मंदौड़ में हुई पंचायतों के बाद तनाव चरम पर पहुंच गया।
दंगे की चिंगारी और 50 हजार विस्थापित
इन पंचायतों से लौटते समय समुदाय विशेष के लोगों ने हिंदू ग्रामीणों पर पथराव और फायरिंग की। इसके बाद पूरे मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों में हिंसा फैल गई। आंकड़ों के मुताबिक दंगों में करीब 60 लोगों की मौत हुई और 50 हजार से अधिक लोग अपने गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए।
तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार पर पक्षपात और एक वर्ग विशेष को बढ़ावा देने के आरोप लगे। यही वजह थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इस मुद्दे को जमकर भुनाया और पश्चिम यूपी से बड़ी जीत हासिल की। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने भारी बहुमत से सरकार बनाई।
सिर्फ सत्ता की सीढ़ी बना कवाल कांड
रवींद्र सिंह ने कहा कि कवाल कांड को भाजपा ने सत्ता की सीढ़ी बना लिया। उन्होंने कहा –> “हमारे बच्चों की मौत के बाद नेताओं ने हमें इस्तेमाल किया। सबने मंचों से भाषण दिए, वोट मांगे और मंत्री-विधायक बन गए। लेकिन जब मदद करने का वक्त आया तो कोई सामने नहीं आया। हम आज भी न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं।”
अबकी बार नाराजगी साफ
गौरव के पिता ने कहा कि वे भाजपा से पूरी तरह नाराज हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इस बार जनता भाजपा को सबक सिखाएगी। > “अबकी बार भाजपा का कोई विधायक यहां नहीं जीतेगा। भाजपा ने अपने ही कार्यकर्ताओं का सम्मान करना छोड़ दिया है। जनता सब देख रही है।”
कवाल कांड: इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी
कवाल कांड सिर्फ दो युवकों की हत्या की घटना नहीं थी, बल्कि इसने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति बदल दी। 60 से अधिक लोगों की मौत हुई। 50 हजार से अधिक लोग विस्थापित हुए। हिंदू-मुस्लिम रिश्तों में दरार गहरी हुई। भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिला और सत्ता में वापसी हुई। आज 12 साल बाद भी यह मामला अदालतों में चल रहा है और पीड़ित परिवार न्याय के लिए भटक रहे हैं।
'वादे किए, लेकिन निभाया कोई नहीं'
“12 साल हो गए, लेकिन कोई बदलाव नहीं दिखा। कवाल कांड में मेरे बेटे गौरव और उसके भाई सचिन को बेरहमी से पीट-पीटकर मार डाला गया था। उस समय भाजपा विपक्ष में थी और बड़े-बड़े नेता हमारे पास आए। राजनाथ सिंह आए, लक्ष्मीकांत बाजपेई आए, सभी ने कहा कि हम आपके साथ हैं, हम वकील करेंगे, मदद करेंगे, लेकिन चुनाव के बाद सबने हमें भुला दिया। कोई नेता फिर हमारी सुध लेने तक नहीं आया।” उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा ने केवल सांत्वना दी और चुनावी मंचों पर इस मुद्दे को भुनाकर सत्ता हासिल कर ली। लेकिन न तो मुकदमों में मदद की गई, न ही परिवारों के लिए कोई ठोस कदम उठाया गया।
सड़क और लाइसेंस का अधूरा वादा
रवींद्र सिंह ने कहा कि कवाल कांड के बाद पीड़ित परिवारों की सुरक्षा और सुविधा के लिए बॉयपास सड़क की मांग उठी थी। इस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कवाल बाइपास सड़क बनवाकर दिया। भाजपा की तरफ से भी नहर की पटरी की सड़क का वादा किया गया था और 15 लाख रुपये भी मंजूर हुए थे, लेकिन वह अधूरी ही रह गई।
“भाजपा ने न तो सड़क पूरी करवाई, न ही रोजगार के लिए लाइसेंस दिए। केवल एक लड़के राहुल का लाइसेंस बना, बाकी किसी को कुछ नहीं मिला। PWD मंत्री ब्रजेश कुंवर तक ने फोन उठाना बंद कर दिया। आज भी हम इलाहाबाद की अदालतों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन सरकार से कोई मदद नहीं मिलती।”
“दिल्ली से लेकर लखनऊ तक कोई सुनवाई नहीं”
गौरव के पिता का दर्द साफ छलक रहा था। उन्होंने कहा कि वे दिल्ली तक नेताओं से गुहार लगाने गए, लेकिन वहां भी यही जवाब मिला कि “हमने जिम्मेदारों को मंत्री और विधायक बना दिया है, अब उन्हीं से कहो।”
आरोप-भाजपा में अपने ही कार्यकर्ताओं नहीं कोई सुनवाई
“भाजपा कार्यकर्ताओं की भी कोई इज्जत नहीं करती। हमारे क्षेत्र का विधायक बिक्रम सैनी कभी हमारे यहां नहीं आए। जिला स्तर पर भी भाजपा के नेता सिर्फ अपने स्वार्थ तक सीमित हैं। जनता और कार्यकर्ताओं की सुनवाई कहीं नहीं होती।”
घटना की याद में छलक पड़े आंसू
27 अगस्त 2013 को कवाल गांव में वह दर्दनाक घटना घटी थी, जिसने पूरे पश्चिमी यूपी को दहला दिया। गौरव और सचिन, अपने गांव मलिकपुरा से कवाल गए थे। वहीं युवती से छेड़छाड़ के आरोपी शाहनवाज की पिटाई के बाद जब दोनों युवक लौट रहे थे तो गांव वालों ने उन्हें घेर लिया और ईंट-पत्थरों से पीट-पीटकर उनकी हत्या कर दी। इलाज के दौरान शाहनवाज की भी मौत हो गई थी। यह घटना तत्कालीन समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान हुई थी। आरोप है कि उसके बाद मुस्लिम समुदाय ने हिंदू परिवारों को प्रताड़ित किया। इससे गुस्सा भड़का और लगातार पंचायतें हुईं। 31 अगस्त और 7 सितंबर 2013 को नगला मंदौड़ में हुई पंचायतों के बाद तनाव चरम पर पहुंच गया।
दंगे की चिंगारी और 50 हजार विस्थापित
इन पंचायतों से लौटते समय समुदाय विशेष के लोगों ने हिंदू ग्रामीणों पर पथराव और फायरिंग की। इसके बाद पूरे मुजफ्फरनगर और आसपास के जिलों में हिंसा फैल गई। आंकड़ों के मुताबिक दंगों में करीब 60 लोगों की मौत हुई और 50 हजार से अधिक लोग अपने गांव छोड़ने पर मजबूर हो गए।
तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार पर पक्षपात और एक वर्ग विशेष को बढ़ावा देने के आरोप लगे। यही वजह थी कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इस मुद्दे को जमकर भुनाया और पश्चिम यूपी से बड़ी जीत हासिल की। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने भारी बहुमत से सरकार बनाई।
सिर्फ सत्ता की सीढ़ी बना कवाल कांड
रवींद्र सिंह ने कहा कि कवाल कांड को भाजपा ने सत्ता की सीढ़ी बना लिया। उन्होंने कहा –> “हमारे बच्चों की मौत के बाद नेताओं ने हमें इस्तेमाल किया। सबने मंचों से भाषण दिए, वोट मांगे और मंत्री-विधायक बन गए। लेकिन जब मदद करने का वक्त आया तो कोई सामने नहीं आया। हम आज भी न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं।”
अबकी बार नाराजगी साफ
गौरव के पिता ने कहा कि वे भाजपा से पूरी तरह नाराज हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि इस बार जनता भाजपा को सबक सिखाएगी। > “अबकी बार भाजपा का कोई विधायक यहां नहीं जीतेगा। भाजपा ने अपने ही कार्यकर्ताओं का सम्मान करना छोड़ दिया है। जनता सब देख रही है।”
कवाल कांड: इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदी
कवाल कांड सिर्फ दो युवकों की हत्या की घटना नहीं थी, बल्कि इसने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति बदल दी। 60 से अधिक लोगों की मौत हुई। 50 हजार से अधिक लोग विस्थापित हुए। हिंदू-मुस्लिम रिश्तों में दरार गहरी हुई। भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ मिला और सत्ता में वापसी हुई। आज 12 साल बाद भी यह मामला अदालतों में चल रहा है और पीड़ित परिवार न्याय के लिए भटक रहे हैं।
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